Andekar Gang Pune: जुर्म, सियासत और बदले का पूरा खुलासा 

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पुणे का कुख्यात Andekar Gang एक बार फिर सुर्खियों में है। इस बार आरोप है कि गैंग के 68 वर्षीय मुखिया, सूर्यकांत उर्फ बंडू आंदेकर, ने ही अपने 18 साल के पोते की हत्या की साजिश रच डाली।

इस त्रासदी का सबसे हृदयविदारक पहलू तब सामने आया, जब आयुष के पिता, गणेश कोमकर, को अपने ही बेटे की चिता को आग देने के लिए नागपुर जेल से पैरोल पर लाया गया। वैकुंठ श्मशान घाट पर एक लाचार पिता का अपने जवान बेटे के शव से लिपटकर रोना, इस गैंगवॉर की असली और दर्दनाक कीमत को बयां कर रहा था।

5 सितंबर को पुणे के भवानी पेठ इलाके में आयुष गणेश कोमकर की उसके घर की पार्किंग में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। पुलिस को शक है कि यह हत्या 1 सितंबर, 2024 को हुए वनराज आंदेकर (बंडू का बेटा और पूर्व NCP पार्षद) के मर्डर का बदला लेने के लिए की गई। वनराज को भी ठीक इसी तरह उनके घर के पास गोलियों से भून दिया गया था।

आयुष की माँ कल्याणी की शिकायत पर पुलिस ने परिवार के ही 13 लोगों पर मामला दर्ज किया है, जिनमें उसके अपने पिता बंडू आंदेकर और भाई कृष्णराज आंदेकर भी शामिल हैं।

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कैसे शुरू हुआ आंदेकर गैंग का आतंक

पुलिस सूत्रों के मुताबिक, इस गैंग की कहानी 70 के दशक में शुरू होती है। आंदेकर परिवार पहले पुराने कपड़ों के बदले नए बर्तन देने का काम करता था। लेकिन जब बंडू के भाई बालकृष्ण उर्फ बालू आंदेकर ने एक स्थानीय गुंडे पर चाकू से हमला किया, तो इस घटना ने उसे जुर्म की दुनिया में पहचान दिला दी।

जल्द ही, बालू ने अपना गिरोह बना लिया, जो अवैध कारोबारों से ‘हफ्ता’ वसूलने और अन्य आपराधिक गतिविधियों में लिप्त हो गया। 1975 के आसपास, बालू आंदेकर और कस्बा पेठ के अप्पा तारू गैंग के बीच झड़पें हुईं और वर्चस्व की इस लड़ाई में आंदेकर गैंग ने अपना दबदबा कायम कर लिया।

आंदेकर-मालवड़कर गैंगवॉर: जब शुरू हुआ खूनी दुश्मनी का दौर

गैंग के अंदरूनी विवाद के चलते प्रमोद मालवड़कर नाम का एक युवक बालू से अलग हो गया और उसने अपना गैंग बना लिया। यह दुश्मनी इतनी बढ़ी कि 17 जुलाई, 1984 को मालवड़कर और उसके साथियों ने शिवाजीनगर कोर्ट परिसर में तलवारों से हमला कर बालू की हत्या कर दी।

इस घटना के बाद शहर में गैंगवॉर का एक लंबा दौर शुरू हो गया, जिसमें कई लोग मारे गए। इन हत्याओं के आरोप में बंडू आंदेकर को गिरफ्तार किया गया और उसे उम्रकैद की सजा हुई। कई साल जेल में रहने के बाद बंडू गैंग का नया सरगना बन गया। आखिरकार, पुलिस ने 1997 में मालवड़कर को एक मुठभेड़ में मार गिराया।

सियासत, पारिवारिक कलह और हत्याएं

एक तरफ गैंगवॉर चल रही थी, तो दूसरी तरफ 90 के दशक में आंदेकर परिवार ने सियासत में कदम रखा। बंडू के भाई और परिवार के अन्य सदस्य पार्षद बने और परिवार की वत्सला आंदेकर 1998 में पुणे की मेयर भी बनीं। परिवार कांग्रेस और NCP से जुड़ा रहा। लेकिन जुर्म का रास्ता नहीं छूटा और बंडू पर मकोका (MCOCA) जैसी गंभीर धाराएं भी लगीं।

पारिवारिक विवाद और वनराज की हत्या

इस पूरे घटनाक्रम की मुख्य वजह एक पारिवारिक विवाद था। वनराज की बहन संजीवनी और बहनोई जयंत कोमकर मानते थे कि वनराज ने ही नगरसेवक रहते हुए अतिक्रमण विभाग से उनकी दुकान तुड़वाई थी।

1 सितंबर, 2024 को इसी बात पर पुलिस स्टेशन में कहासुनी हुई, जहाँ संजीवनी ने वनराज को जान से मारने की धमकी दी। पुलिस के अनुसार, इसी रंजिश के चलते संजीवनी, जयंत और उसके भाई गणेश कोमकर (मृतक आयुष के पिता) ने मिलकर वनराज की हत्या की साजिश रची।

पुलिस ने बताया कि वनराज की हत्या का बदला लेने के लिए आंदेकर गैंग एक अन्य दुश्मन के बेटे को मारना चाहता था। लेकिन यह प्लान फेल हो गया। इसके पांच दिन बाद, गैंग ने अपना बदला तो लिया, लेकिन इस बार उनका निशाना बदल गया और इस पारिवारिक दुश्मनी की भेंट चढ़ गया 18 साल का आयुष कोमकर।

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