The Supreme Court has clarified that a consensual relationship between adults cannot be treated as moral misconduct for denying police recruitment, marking an important development in employment rights and recruitment fairness. | PuneNewsHub.com
पुलिस भर्ती रद्द होने पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी, बदलते सामाजिक नजरिए पर भी हुई महत्वपूर्ण चर्चा
नई दिल्ली | जून 2026
क्या किसी व्यक्ति का पुराना प्रेम संबंध उसकी सरकारी नौकरी छीन सकता है?
सुप्रीम कोर्ट के एक हालिया फैसले ने इस सवाल पर महत्वपूर्ण स्पष्टता दी है। अदालत ने कहा है कि दो वयस्कों के बीच सहमति से बना रिश्ता अपने आप में “नैतिक पतन” (Moral Turpitude) का प्रमाण नहीं माना जा सकता और केवल इसी आधार पर किसी उम्मीदवार को सरकारी नौकरी से वंचित नहीं किया जा सकता।
यह फैसला न केवल एक व्यक्ति को राहत देने वाला है, बल्कि भर्ती प्रक्रियाओं और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को लेकर भी एक व्यापक संदेश देता है।
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क्या था पूरा मामला?
मामला तेलंगाना के एक पुलिस भर्ती उम्मीदवार तिरुपति से जुड़ा है।
रिपोर्टों के अनुसार, वर्ष 2014 में पड़ोस में रहने वाली एक महिला के साथ उनका लगभग चार साल तक संबंध रहा था। बाद में दोनों की शादी नहीं हो सकी और विवाद उत्पन्न हुआ। इस मामले में शिकायत दर्ज हुई, लेकिन बाद में दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया।
महत्वपूर्ण बात यह रही कि मामले में बलात्कार का आरोप तय नहीं हुआ था और आपराधिक दोषसिद्धि भी नहीं हुई।
इसके बावजूद पुलिस भर्ती बोर्ड ने उम्मीदवार के चयन को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि मामला “नैतिक पतन” की श्रेणी में आता है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
8 जून 2026 को सुनाए गए फैसले में सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने भर्ती बोर्ड के फैसले को अनुचित बताया।
अदालत ने कहा कि वयस्कों के बीच सहमति से बने रिश्ते आधुनिक समाज में असामान्य नहीं हैं। केवल किसी संबंध का विवाह तक न पहुंचना किसी व्यक्ति के चरित्र या आपराधिक प्रवृत्ति का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
साथ ही कोर्ट ने यह भी माना कि उम्मीदवार ने अपने रिकॉर्ड और मामले की जानकारी छिपाई नहीं थी, बल्कि पूरी पारदर्शिता के साथ जानकारी दी थी।
क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला व्यक्तिगत स्वतंत्रता और रोजगार के अधिकार के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
वरिष्ठ कानूनी विश्लेषकों के अनुसार, भर्ती एजेंसियों को किसी उम्मीदवार के खिलाफ वास्तविक आपराधिक आचरण और केवल व्यक्तिगत संबंधों के बीच स्पष्ट अंतर करना होगा।
विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि आधुनिक समाज में रिश्तों और सामाजिक व्यवहार के स्वरूप बदल रहे हैं। ऐसे में पुरानी धारणाओं के आधार पर रोजगार के अवसर सीमित करना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।
लोगों और समाज की प्रतिक्रिया
फैसले को लेकर सोशल मीडिया और कानूनी समुदाय में व्यापक चर्चा देखने को मिली।
कई लोगों ने इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निष्पक्ष भर्ती प्रक्रिया के पक्ष में महत्वपूर्ण निर्णय बताया। वहीं कुछ लोगों का मत है कि सरकारी सेवाओं में चरित्र मूल्यांकन के मानकों को लेकर स्पष्ट दिशानिर्देश भी आवश्यक हैं।
हालांकि अधिकांश विशेषज्ञ इस बात पर सहमत दिखे कि किसी व्यक्ति के निजी जीवन और उसके पेशेवर दायित्वों का मूल्यांकन अलग-अलग आधार पर होना चाहिए।
आगे क्या?
यह फैसला भविष्य में भर्ती एजेंसियों और सरकारी संस्थानों के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ बन सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अब संस्थानों को उम्मीदवारों के मूल्यांकन में तथ्यों, न्यायिक रिकॉर्ड और वास्तविक आपराधिक आचरण पर अधिक ध्यान देना होगा, न कि केवल सामाजिक धारणाओं पर।
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय केवल एक उम्मीदवार की नौकरी तक सीमित नहीं है। यह बदलते भारतीय समाज, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और रोजगार में समान अवसरों को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी संदेश भी देता है।
