नई दिल्ली: बारामती की सांसद सुप्रिया सुले के हालिया राजनीतिक रुख ने राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया है, जहाँ उन्होंने एक तरफ प्रधानमंत्री मोदी की प्रशंसा की और दूसरी तरफ NEET परीक्षा मामले पर सरकार को घेरा। हमने इस दोहरे रुख को समझने के लिए स्थानीय राजनीतिक विशेषज्ञों की राय जानी।
जब सदन में गूंजी मोदी की तारीफ
पुणे के एक राजनीतिक विशेषज्ञ, निखिल बोरा, ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर इस मामले पर अपनी राय व्यक्त की। उन्होंने बताया, “आपको सबसे पहले राष्ट्रवादी होना चाहिए। यह सुप्रिया सुले की परिपक्व राजनीति को दर्शाता है। वह राष्ट्रीय मुद्दों पर दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सरकार का समर्थन करती हैं, लेकिन जब स्थानीय मुद्दों जैसे छात्रों की बात आती है, तो वह मजबूत विपक्ष की भूमिका निभाती हैं। पुणे की जनता ऐसे संतुलित नेतृत्व की उम्मीद करती है।“
यह पूरा मामला तब शुरू हुआ जब सुप्रिया सुले ने लोकसभा में उस वाकये का जिक्र किया जब प्रधानमंत्री मोदी ने एक सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करने के लिए उन पर भरोसा जताया। सुले ने इसे पीएम का “बड़प्पन” करार देते हुए कहा, “जब देश की बात आती है, तो देश सबसे पहले है।” उनके इस बयान ने सदन में बैठे सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों के सदस्यों का ध्यान खींचा।
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जैसे ही तारीफ की खबरें फैलीं, कयासों का बाजार गर्म हो गया। इन सवालों का जवाब भी उन्होंने खुद ही दे दिया, जब वह NEET-UG और UGC-NET परीक्षाओं में हुई धांधली के मुद्दे पर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलती दिखीं। वह उस विपक्षी प्रतिनिधिमंडल का अहम हिस्सा थीं, जिसने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मिलकर इस मामले में हस्तक्षेप की मांग की।
निखिल बोरा जैसे विशेषज्ञों की राय से यह स्पष्ट होता है कि सुप्रिया सुले का यह अंदाज एक परिपक्व राजनेता की निशानी है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर सरकार के साथ खड़ा हो सकता है, लेकिन उसी सरकार को जनहित के मुद्दों पर घेरने में कोई कोताही नहीं बरतता। एक ही समय में प्रधानमंत्री की तारीफ और उनकी सरकार की नीतियों पर तीखा हमला, सुप्रिया सुले ने यह साबित कर दिया है कि वह राजनीति की इस जटिल बिसात पर एक मंझी हुई खिलाड़ी हैं, जिसके हर कदम का असर पुणे की स्थानीय राजनीति पर भी महसूस किया जाएगा।
